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Wednesday, December 03, 2014

ठहर के ..

कभी  बस  कुछ  बातों  से
कितनी गहराई नप जाती है
कैसे रात के कोहरे की चादर से निकलके
सर्दी की धूप खिल के आती है ।

गर्म  चाय का धुआं
कितनी गर्माइश  देता है
माँ  के हाथ के खाने का  स्वाद
कितनी यादें सेता है ।

कैसे रात के सन्नाटे में
कितना शोर है सपनों का
घर से फ़ोन के मैसेज की आहट  में
कितना एहसास है अपनों का |

कब दिन  आता है
कब ढल जाता है
इस आस पास की हलचल में
समय यूं निकल जाता है ।

हमेशा चक्रव्यूह से चलने वाले इस रूटीन में,
इसका हलके हलके गुज़रना महसूस करना
शाम की ढलती धूप  के साथ
दूर से जाती ट्रैन की सीटी को सुनना ।

कभी गिनें हैं सारे लम्हे इस पहर के
कभी देखा है रुक के , ठहर के.....

ठहर के  :) 

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